Saturday, 21 July 2018
Saturday, 17 February 2018
यह कहानी आपको झकझोर कर रख देगी अच्छी सीख अवश्य पढ़ें....
एक बार की बात है 1 हंस और 1 हंसिनी थी वे दोनो हरिद्वार में रहते थे। वे दोनों एक बार भटकते-भटकते एक उजड़े व बहुत ही वीरान से रेगिस्तानी इलाके में आ गये। हंसिनी ने हंस से कहा कि हम ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ?? यहाँ पर न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं, यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा।
हंस और हंहिनी को भटकते हुये शाम हो गई तो हंस ने हंसिनी से कहा कि आज की रात हम किसी तरह कट लेते है, सुबह होते ही हरिद्वार वापिस लौट चलेंगें। रात हुई तो देखा कि जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उसी पेड़ पर एक उल्लू बैठा था।
और वह जोर से चिल्लाने लगा।
हंसिनी ने हंस से कहा- अरे ये उल्लू के चिल्लाने की वजह से तो यहाँ रात में सो भी नहीं सकते।
हंस ने हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो,
मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??
ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा ही रहेगा।
पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।
सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ कर दो।
हंस ने कहा:- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद!
यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा…
पीछे से उल्लू चिल्लाया,
अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।
हंस चौंका:- उसने कहा, आपकी पत्नी ??
अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,
मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!
उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।
दोनों के बीच इस बात से विवाद बढ़ गया और पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये। कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। पंचलोग भी आ गये!
बोले:- भाई किस बात का विवाद है ??
लोगों ने पंचों को बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है! लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे। हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए!
फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!
यह बात सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया।
उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!
रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई – ऐ मित्र हंस, रुको!
हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ??
पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?
उल्लू ने कहा:- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी!
लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था
कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है!
मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है। यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!
शायद 65 साल की आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने उम्मीदवार की योग्यता न देखते हुए, हमेशा ये हमारी जाति का है। ये हमारी पार्टी का है के आधार पर अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है, देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैँ!
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धीरूभाई अंबानी || Dhirubhai Ambani || Safalta Aapki
*धीरूभाई अंबानी*
एक आदमी जो हाईस्कूल की शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाया. वह इतने गरीब परिवार से था कि खर्चा चलाने के लिए उसे अपनी किशोरावस्था से ही नाश्ते की रेहड़ी लगाने से लेकर पेट्रोल पंप पर तेल भरने तक का काम करना पड़ा. ऐसे लड़के ने जब एक वृद्ध के तौर पर दुनिया को अलविदा कहा तो उसकी सम्पति का मूल्य 62 हजार करोड़ रूपये से भी ज्यादा था.
अगर आप अब भी इस शख्सशियत को नहीं पहचान पाएं तो हम बात कर रहे हैं, धीरूभाई अंबानी की. एक ऐसा सफल चेहरा जिसने हरेक गरीब को उम्मीद दी कि सफल होने के लिए पैसा नहीं नियत चाहिए.
सफलता उन्हीं को मिलती है जो उसके लिए जोखिम उठाते हैं. धीरूभाई ने बार — बार साबित किया कि जोखिम लेना व्यवसाय का नहीं आगे बढ़ने का मंत्र है.
शुरूआती जीवन:
28 दिसम्बर, 1932 को गुजरात के जूनागढ़ के छोटे से गांव चोरवाड़ में धीरजलाल हीरालाल अंबानी का जन्म हुआ. पिता गोर्धनभाई अंबानी एक शिक्षक थे. माता जमनाबेन एक सामान्य गृहिणी थी. धीरूभाई के चार भाई—बहन और थे. इतने बड़े परिवार का लालन—पालन करना अध्यापक गोर्धनभाई के लिए सरल काम न था. एक समय ऐसा आया कि आर्थिक परेशानियों केी वजह से धीरू भाई को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और उनकी स्कूली शिक्षा भी अधूरी रह गई. पिता की मदद करने के लिए धीरूभाई ने छोटे—मोटे काम करने शुरू कर दिए.
व्यवसायिक सफर की शुरूआत:
यह उदाहरण कि हरेक सफलता के पीछे ढेरों असफलताएं छुपी हुई होती है, धीरूभाई अंबानी पर एकदम सटीक खरी उतरती हैं. पढ़ाई छोड़ने के बाद पहले पहल धीरूभाई ने फल और नाश्ता बेचने का काम शुरू किया, लेकिन कुछ खास फायदा नहीं हुआ. उन्होंने दिमाग लगाया और गांव के नजदीक स्थित धार्मिक पर्यटन स्थल गिरनार में पकोड़े बेचने का काम शुरू कर दिया. यह काम पूरी तरह आने वाले पर्यटकों पर निर्भर था, जो साल के कुछ समय तो अच्छा चलता था बाकि समय इसमें कोई खास लाभ नहीं था. धीरूभाई ने इस काम को भी कुछ समय बाद बंद कर दिया. बिजनेस में मिली पहली दो असफलताओं के बाद उनके पिता ने उन्हें नौकरी करने की सलाह दी.
नौकरी के दौरान भी बिजनेस:
धीरूभाई के बड़े भाई रमणीक भाई उन दिनों यमन में नौकरी किया करते थे. उनकी मदद से धीरूभाई को भी यमन जाने का मौका मिला. वहां उन्होंने शेल कंपनी के पेट्रोल पंप पर नौकरी की शुरूआत की और महज दो साल में ही अपनी योग्यता की वजह से प्रबंधक के पद तक पहुंच गए. इस नौकरी के दौरान भी उनका मन इसमें कम और व्यवसाय करने के मौको की तरफ ज्यादा रहा. उन्होंने उस हरेक संभावना पर इस समय में विचार किया कि किस तरह वे सफल बिजनेस मैन बन सकते हैं. दो छोटी घटनाएं बिजनेस के प्रति उनके जूनून को बयां करती हैं.
यह दोनों घटनाएं उस समय की है जब वे शेल कंपनी में अपनी सेवाएं दे रहे थे. जहां वे काम करते थे, वहां काम करने वाला कर्मियों को चाय महज 25 पैसे में मिलती थी, लेकिन धीरूभाई पास ही एक बड़े होटल में चाय पीने जाते थे, जहां चाय के लिए 1 रूपया चुकाना पड़ता था. उनसे जब इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उसे बड़े होटल में बड़े—बड़े व्यापारी आते हैं और बिजनेस के बारे में बाते करते हैं. उन्हें ही सुनने जाता हूं ताकि व्यापार की बारीकियों को समझ सकूं.
धीरूभाई ने अपने ही तरीके से बिजनेस मैनेजमेंट की शिक्षा ली. जिन्होंने आगे चलकर व्हाटर्न और हावर्ड से पारम्पिरक तरीके से डिग्री लेने वाले को नौकरी पर रखा.
इसी तरह दूसरी घटना उनकी पारखी नजर और अवसर भुनाने की क्षमता की ओर इशारा करती है. हुआ यूं कि उन दिनों में यमन मे चांदी के सिक्कों का प्रचलन था. धीरूभाई को एहसास हुआ कि इन सिक्कों की चांदी का मूल्य सिक्कों के मूल्य से ज्यादा है और उन्होंने लंदन की एक कंपनी को इन सिक्कों को गलाकर आपूर्ति करनी शुरू कर दी. यमन की सरकार को जब तक इस बात का पता चलता वे मोटा मुनाफा कमा चुके थे. ये दोनों घटनाएं इशारा कर रही थी कि धीरूभाई अंबानी के पास एक सफल बिजनेसमैन बनने के सारे गुण हैं.
चुनौतियां और सफलतायमन में धीरूभाई का समय बीत रहा था कि वहां आजादी के लिए लड़ाई शुरू हो गई और ढेरों भारतीयों को यमन छोड़ना पड़ा. इस परेशानी के आलम में धीरूभाई को भी यमन छोड़ना पड़ा. ईश्वर ने एक सफल बिजनेसमैन बनाने के लिए परिस्थितियां गढ़नी शुरू कर दी. इस नौकरी के चले जाने के बाद उन्होंने नौकरी की जगह बिजनेस करने का निर्णय लिया, लेकिन व्यवसाय शुरू करने के लिए पैसों की जरूरत थी. धीरूभाई के पास निवेश के लिए बड़ी रकम नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने मामा त्रयम्बकलाल दामाणी के साथ मसालों और शक्कर के व्यापार की शुरूआत की. यहीं पर रिलायंस कमर्शियल कॉरर्पोरेशन की नींव पड़ी.
इसके बाद रिलायंस ने सूत के कारोबार में प्रवेश किया. यहां भी सफलता ने धीरूभाई के कदम चूमे और जल्दी ही वे बॉम्बे सूत व्यपारी संघ के कर्ता—धर्ता बन गए. यह बिजनेस जोखिमों से भरा हुआ था और उनके मामा को जोखिम पसंद नहीं था इसलिए जल्दी ही दोनों के रास्ते अलग हो गए. इससे रिलायंस पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा और 1966 में रिलायंस टैक्सटाइल्स अस्तित्व में आया. इसी साल रिलायंस ने अहमदाबाद के नरोदा में टेक्सटाइल मिल की स्थापना की.
विमल की ब्रांडिंग इस तरह की गई कि जल्दी ही यह घर—घर में पहचाना जाने लगा और विमल का कपड़ा बड़ा भारतीय नाम बन गया. विमल दरअसल उनके बड़े भाई रमणीक लाल के बेटे का नाम था. इन्हीं सब संघर्षों के बीच उनका विवाह कोकिलाबेन से हुआ जिनसे उन्हें दो बेटे मुकेश और अनिल तथा दो बेटियां दीप्ती और नीना हुईं
उन्होंने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और रिलायंस कपड़े के साथ ही पेट्रोलियम और दूरसंचार जैसी कंपनियों के साथ भारत की सबसे बड़ी कंपनी बन गई.
इन सबके बीच धीरूभाई अंबानी पर सरकार की नीतियों को प्रभावित करने और नीतियों की कमियों से लाभ कमाने के आरोप भी लगते रहे. उनके और नुस्ली वाडिया के बीच होने वाले बिजनेस घमासान पर भी बहुत कुछ लिखा गया. उनके जीवन से प्रेरित एक फिल्म गुरू बनाई गई जिसमें अभिषेक बच्चन ने उनकी भूमिका का निर्वाह किया. लगातार बढ़ते बिजनेस के बीच उनका स्वास्थ्य खराब हुआ और 6 जुलाई 2002 को उनकी मृत्यु हो गई. मृत्यु के बाद उनके काम को बड़े बेटे मुकेश अंबानी ने संभाला.
पुरस्कार एवं सम्मान:
1. द इकोनॉमिक टाइम्स लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार 10 अगस्त 2001
2. टीएनएस-मोड सर्वे- इंडियाज मोस्ट एडमायर्ड सीईओ 26 जुलाई 1999
3. कैमटेक फाउंडेशन- मैन ऑफ द सेंचूरी अवार्ड 8 नवम्बर 2000
4. फिक्की- इंडियन आंत्रप्रेन्याेर ऑफ द 20 सेंचुरी 24 मार्च 2000
5. द एक्सरर्प्ट फ्रॉम एशिया वीक 1998 29 मई 1998
6. द एक्सरर्प्ट फ्रॉम एशिया वीक 2000 26 मई 2000
7. द टाइम्स ऑफ इंडिया- क्रियेटर ऑफ द वेल्थ ऑफ द सेंचूरी 8 जनवरी 2000
8. बिजनेस बॉरो- इंडियन बिजनेसमैन ऑफ द ईयर 6 दिसम्बर 1999
9. एशिया वीक हॉल ऑफ फेम 16 अक्टूबर 1998
10. व्हार्टन डीन मॉडल फोर धीरूभाई अंबानी 15 जून 1998
11. बिजनेस वीक स्टार ऑफ द एशिया 29 जून 1998
12. बिजनेस इंडिया-बिजनेस मैन ऑफ़ द ईयर 31 अक्टूबर 1999
धीरूभाई अंबानी के प्रेरक वाक्य:
• मुझे न शब्द सुनाई ही नहीं देता.
• रिलायंस के विकास की कोई सीमा नहीं है.
• अपना नजरिया बदलते रहिए और यह काम आप तभी कर सकते हैं जब आप सपने देखते हों.
• बड़ा सोचिए, जल्दी सोचिए और आगे की सोचिए.
• सपने हमेशा बड़े होने चाहिए, प्रतिबद्धता हमेशा गहरी होनी चाहिए और प्रयास हमेशा महान होने चाहिए.
• मुश्किल परिस्थितियों का अवसर की तरह देखिए और उसे अपने लाभ के लिए उपयोग कीजिए.
• युवा शक्ति बड़ा परिवर्तन कर सकती है, उन्हें अवसर दीजिए, वे अनंत उर्जा के स्रोत हैं.
• सम्बन्ध और आस्था विकास की नींव होते हैं.
मिल्खा सिंह की सफलता की कहानी
*मिल्खा सिंह*
मिल्खा सिंह का जन्म पाकिस्तान के लायलपुर में 8 अक्टूबर, 1935 को हुआ था। उन्होंने अपने माता-पिता को भारत-पाक विभाजन के समय हुए दंगों में खो दिया था। वह भारत उस ट्रेन से आए थे जो पाकिस्तान का बॉर्डर पार करके शरणार्थियों को भारत लाई थी। अत: परिवार के नाम पर उनकी सहायता के लिए उनके बड़े भाई-बहन थे। मिल्खा सिंह का नाम सुर्ख़ियों में तब आया जब उन्होंने कटक में हुए राष्ट्रीय खेलों में 200 तथा 400 मीटर में रिकॉर्ड तोड़ दिए। 1958 में ही उन्होंने टोकियो में हुए एशियाई खेलों में 200 तथा 400 मीटर में एशियाई रिकॉर्ड तोड़ते हुए स्वर्ण पदक जीते। इसी वर्ष अर्थात 1958 में कार्डिफ (ब्रिटेन) में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता। उनकी इन्हीं सफलताओं के कारण 1958 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया। मिल्खा सिंह का नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ने का भी एक कारण था। वह तब लाहौर में भारत-पाक प्रतियोगीता में दौड़ रहे थे। वह एशिया के प्रतिष्ठित धावक पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को 200 मीटर में पछाड़ते हुए तेज़ी से आगे निकल गए, तब लोगों ने कहा- ”मिल्खा सिंह दौड़ नहीं रहे थे, उड़ रहे थे।” बस उनका नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ गया।
मिल्खा सिंह ने अनेक बार अपनी खेल योग्यता सिद्ध की। उन्होंने 1968 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ दिया। उन्होंने ओलंपिक के पिछले 59 सेकंड का रिकॉर्ड तोड़ते हुए दौड़ पूरी की। उनकी इस उपलब्धि को पंजाब में परी-कथा की भांति याद किया जाता है और यह पंजाब की समृद्ध विरासत का हिस्सा बन चुकी है। इस वक्त अनेक ओलंपिक खिलाड़ियों ने रिकॉर्ड तोड़ा था। उनके साथ विश्व के श्रेष्ठतम एथलीट हिस्सा ले रहे थे। 1960 में रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर दौड़ की प्रथम हीट में द्वितीय स्थान (47.6 सेकंड) पाया था। फिर सेमी फाइनल में 45.90 सेकंड का समय निकालकर अमेरिकी खिलाड़ी को हराकर द्वितीय स्थान पाया था। फाइनल में वह सबसे आगे दौड़ रहे थे। उन्होंने देखा कि सभी खिलाड़ी काफी पीछे हैं अत: उन्होंने अपनी गति थोड़ी धीमी कर दी। परन्तु दूसरे खिलाड़ी गति बढ़ाते हुए उनसे आगे निकल गए। अब उन्होंने पूरा जोर लगाया, परन्तु उन खिलाड़ियों से आगे नहीं निकल सके। अमेरिकी खिलाड़ी ओटिस डेविस और कॉफमैन ने 44.8 सेकंड का समय निकाल कर प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया। दक्षिण अफ्रीका के मैल स्पेन्स ने 45.4 सेकंड में दौड़ पूरी कर तृतीय स्थान प्राप्त किया। मिल्खा सिंह ने 45.6 सेकंड का समय निकाल कर मात्र 0.1 सेकंड से कांस्य पदक पाने का मौका खो दिया।
मिल्खा सिंह को बाद में अहसास हुआ कि गति को शुरू में कम करना घातक सिद्ध हुआ। विश्व के महान एथलीटों के साथ प्रतिस्पर्धा में वह पदक पाने से चूक गए। मिल्खा सिंह ने खेलों में उस समय सफलता प्राप्त की जब खिलाड़ियों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, न ही उनके लिए किसी ट्रेनिंग की व्यवस्था थी। आज इतने वर्षों बाद भी कोई एथलीट ओलंपिक में पदक पाने में कामयाब नहीं हो सका है। रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह इतने लोकप्रिय हो गए थे कि जब वह स्टेडियम में घुसते थे, दर्शक उनका जोशपूर्वक स्वागत करते थे। यद्यपि वहाँ वह टॉप के खिलाड़ी नहीं थे, परन्तु सर्वश्रेष्ठ धावकों में उनका नाम अवश्य था। उनकी लोकप्रियता का दूसरा कारण उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी व लंबे बाल थे। लोग उस वक्त सिख धर्म के बारे में अधिक नहीं जानते थे। अत: लोगों को लगता था कि कोई साधु इतनी अच्छी दौड़ लगा रहा है। उस वक्त ‘पटखा’ का चलन भी नहीं था, अत: सिख सिर पर रूमाल बाँध लेते थे। मिल्खा सिंह की लोकप्रियता का एक अन्य कारण यह था कि रोम पहुंचने के पूर्व वह यूरोप के टूर में अनेक बड़े खिलाडियों को हरा चुके थे और उनके रोम पहुँचने के पूर्व उनकी लोकप्रियता की चर्चा वहाँ पहुंच चुकी थी।
मिल्खा सिंह के जीवन में दो घटनाए बहुत महत्व रखती हैं। प्रथम-भारत-पाक विभाजन की घटना जिसमें उनके माता-पिता का कत्ल हो गया तथा अन्य रिश्तेदारों को भी खोना पड़ा। दूसरी-रोम ओलंपिक की घटना, जिसमें वह पदक पाने से चूक गए। इसी प्रथम घटना के कारण जब मिल्खा सिंह को पाकिस्तान में दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने का आमंत्रण मिल्खा तो वह विशेष उत्साहित नहीं हुए। लेकिन उन्हें एशिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के साथ दौड़ने के लिए मनाया गया। उस वक्त पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ धावक अब्दुल खादिक था जो अनेक एशियाई प्रतियोगिताओं में 200 मीटर की दौड़ जीत चुका था। ज्यों ही 200 मीटर की दौड़ शुरू हुई यूं लगा कि मानो मिल्खा सिंह दौड़ नहीं, उड़ रहें हों। उन्होंने अब्दुल खादिक को बहुत पीछे छोड़ दिया। लोग उनकी दौड़ को आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। तभी यह घोषणा की गई कि मिल्खा सिंह दौड़ने के स्थान पर उड़ रहे थे और मिल्खा सिंह को ‘फ़्लाइंग सिख’ कहा जाने लगा। उस दौड़ के वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अय्यूब भी मौजूद थे। इस दौड़ में जीत के पश्चात् मिल्खा सिंह को राष्ट्रपति से मिलने के लिए वि.आई.पी. गैलरी में ले जाया गया। मिल्खा सिंह द्वारा जीती गई ट्राफियां, पदक, उनके जूते (जिन्हें पहन कर उन्होंने विश्व रिकार्ड तोड़ा था), ब्लेजर यूनीफार्म उन्होंने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में बने राष्ट्रीय खेल संग्रहालय को दान में दे दिए थे। 1962 में एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता। खेलों से रिटायरमेंट के पश्चात् वह इस समय पंजाब में खेल, युवा तथा शिक्षा विभाग में अतिरिक्त खेल निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
उनका विवाह पूर्व अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी निर्मल से हुआ था। मिल्खा सिंह के एक पुत्र तथा तीन पुत्रियां है। उनका पुत्र चिरंजीव मिल्खा सिंह (जीव मिल्खा सिंह भी कहा जाता है) भारत के टॉप गोल्फ खिलाड़ियों में से एक है तथा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों पुरस्कार जीत चुका है। उसने 1990 में बीजिंग के एशियाई खेलों में भी भाग लिया था। मिल्खा सिंह की तीव्र इच्छा है कि कोई भारतीय एथलीट ओलंपिक पदक जीते, जो पदक वह अपनी छोटी-सी गलती के कारण जीतने से चूक गए थे। मिल्खा सिंह चाहते हैं कि वह अपने पद से रिटायर होने के पश्चात् एक एथलेटिक अकादमी चंडीगढ़ या आसपास खोलें ताकि वह देश के लिए श्रेष्ठ एथलीट तैयार कर सकें। मिल्खा सिंह अपनी लौह इच्छा शक्ति के दम पर ही उस स्थान पर पहुँच सके, जहाँ आज कोई भी खिलाड़ी बिना औपचारिक ट्रेनिंग के नहीं पहुँच सका।
*उपलब्धियां:*
1957 में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर में 47।5 सेकंड का नया रिकॉर्ड बनाया।
टोकियो जापान में हुए तीसरे एशियाड (1958) में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर तथा 200 मीटर में दो नए रिकॉर्ड स्थापित किए।
जकार्ता (इंडोनेशिया) में हुए चौथे एशियाड (1959) में उन्होंने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता।
1959 में भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया।
1960 में रोम ओलंपिक में उन्होंने 400 मीटर दौड़ का रिकॉर्ड तोड़ा।
1962 के एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता।
Sunday, 4 February 2018
संदीप माहेश्वरी, Safalta Aapki
*संदीप माहेश्वरी*
संदीप माहेश्वरी युवाओं के लिए प्रेरक और आज का सबसे प्रासंगिक नाम है। भारत के शीर्ष उद्यमियों में तेजी से उभरने वाले नामों में एक नाम संदीप महेश्वरी का भी है। संदीप महेश्वरी ने ये सफलता काफी कम समय में हासिल की है।
संदीप इमेजबाजार.कॉम के संस्थापक और चीफ एक्सक्यूटिव ऑफिसर हैं। इमेज बाजार भारतीय वस्तुओं और व्यक्तियों का चित्र सहेजने वाली सबसे बड़ी ऑनलाईन साइट है। इसके पोर्टल में एक लाख से भी अधिक नये मॉडलों की तस्वीरें संरक्षित है। इतना ही नहीं कई हजार कैमरामैन इस वेबपेज के साथ काम करते हैं।
तीव्र बुद्धि के स्वामी संदीप को इस कार्य के लिए न सिर्फ काफी मेहनत नहीं करनी पड़ी, बल्कि उन्होंने अपने दिमाग का सही उपयोग कर इसे हासिल किया।
संदीप सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि देश विदेश में काफी नाम कमा चुके हैं। संदीप युवाओं को आगे लाने के लिए, उनके भविष्य को लेकर उन्हें निराशा से बाहर निकालने के लिए कई जगह सेमिनार भी आयोजित कराते हैं।
उनका ‘फ्री मोटिवेशनल लाइफ चेजिंग सेमिनार्स’ काफी प्रसिद्ध है।
34 वर्षीय संदीप अपने जीवन में कई संकटों का सामना करते हुए इस मुकाम पर पहुँचें है।
*संदीप माहेश्वरी का आरंभिक जीवन:*
28 सितम्बर 1980 को सन्दीप महेश्वरी का जन्म दिल्ली में हुआ था। संदीप बचपन से ही बहुत कुछ कर करने के बारे में सोचते थे। वे अपने बचपन के बारे में खुलकर कभी ज्यादा बात नहीं करते हैं। उनके पिता कारोबारी थे। संदीप के पिता का एल्युमीनियम का कारोबार था। लगभग दस साल चलने के बाद ये व्यापार ठप्प हो गया। परिवार की सहायता के लिए उन्होंने मां के साथ मिलकर मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनी को ज्वाइन किया, जिसमें घर में ही चीजों को बनाना और बेचना होता था।
एमएलएम का काम भी ज्यादा दिन नहीं चला। पिता का कारोबार थम जाने के कारण संदीप का पूरा परिवार आर्थिक संकट से जूझने लगा। सन्दीप के पिता काफी परेशान रहते थे। इस संकट की घड़ी में संदीप के परिवार ने टूटने की अपेक्षा खुद को और ज्यादा संगठित किया। उसी समय से संदीप अपने परिवार के लिए कुछ करना चाहते थे।
इस छोटे व्यवसाय के बाद उन्होंने और भी कई काम शुरु किये, जो ज्यादा दिनों तक नहीं चले। अंत में उन्होंने परिवार चलाने के लिए पीसीओ का काम आरंभ किया। चुंकि उस समय मोबाइल उतना नहीं था, तो ये काम कुछ दिनों के लिए अच्छा चला। उनकी मां ये काम संभालती थी।
*संदीप माहेश्वरी की शिक्षा:*
संदीप को परिवारिक और आर्थिक संकट के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। दिल्ली के करोड़ीमल कॉलेज से वे कामर्स में स्नातक कर रहे थे, और 2000 में उन्होंने फोटोग्राफी करना आरंभ किया था, और आरंभ में कई तरह से उसे पेशे के रूप में अपनाने की कोशिश की। इसी सिलसिले में कुछ मित्रों के साथ एक छोटा सा व्यवसाय भी आरंभ किया, किन्तु वे सभी असफल हो गये। किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही चुना था।
*संदीप माहेश्वरी के जीवन में बदलाव:*
संदीप माहेश्वरी निराशा के साथ जीने लगे थे, लेकिन उसी समय एक बार उन्होंने एक मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनी के सेमिनार परिचर्चा में दोस्तों के साथ हिस्सा लिया। 18 साल के संदीप की परिपक्वता उतनी नहीं थी, उन्हें सेमिनार में कुछ समझ नही आया था, उन्होंने जो कुछ भी सुना सब उनके लिए अन्जानी सी बात थी। उस 21 साल के लड़के ने संदीप को एक बार फिर से अपनी निराशा से संघर्ष करने का हौसला दिया। इस हौसले के साथ ही संदीप को नये तरह की उद्यम आरंभ करने की प्रेरणा मिली, और यह भी कि वो अपनी तरह कई युवाओं को जीवन संघर्ष में प्रेरित कर सकते हैं।
अब सन्दीप ने ठान लिया कि वह 21 साल के लड़के की तरह ही नया उद्यम आरंभ करेंगे, ये आवाज उसके अंर्तमन से आ रही थी। ये विचार आते ही वो अपने कुछ मित्रों को संग लेकर उस लडके की कम्पनी में गये पर वहाँ कुछ हाथ नहीं लगा। किसी को कंपनी ने नहीं रखा, मित्र भी उनकी खिल्ली उड़ाने लगे थे। इस असफलता ने उन्हें थोड़ी सा पीछे कर दिया पर हरा नहीं पाई। संदीप असफलताओं का मूल्यांकन करने लगे। उन्होंने अपनी गलतियों को सुधारने का उपाय सोचा और उन्हें लगा कि शायद साझेदारी पर विश्वास न करके भूल की है। संदीप को लगने लगा कि जब तक आप संघर्ष के कटुत्कित अनुभव से नहीं गुजरते हैं, सफलता आपको नहीं मिलेगी। इसके बाद उन्होने कई और असफल प्रयास किये।
*संदीप माहेश्वरी की फोटोग्राफी:*
मॉडलिंग के दौरान एक मित्र कुछ तस्वीर लेकर उनके पास आया। उन तस्वीरों को देखकर उन्हें लगा कि उनके अंतरत्मा की आवाज इसी व्यवसाय के लिए आ रही है। उन्होंने कुछ जानकारी हासिल कर 2 सप्ताह के फोटोग्राफी के प्रशिक्षण कोर्स में दाखिला ले लिया। कोर्स ज्वाइन करने के बाद उन्होंने एक मंहगा कैमरा भी खरीदा और तस्वीर खींचना आरंभ कर दिया। फोटोग्राफी कोर्स पूरा करने के बाद भी उनके लिए रास्ता कठिन ही था। उन्होंने देखा कि देश में लाखों लोग फोटोग्राफर के पेशा के लिए धक्का खा रहे हैं। उन्हें लगने लगा कि ऐसा क्या करना चाहिए जो फोटोग्राफी को दूसरे लेवल पर ले जाकर नया व्यवसाय का रूप दे।
उन्होंने हिम्मत जुटाकर एक अखबार में फ्री पोर्ट फोलियो का विज्ञापन दिया, और उस विज्ञापन को पढ़कर कई लोग आये। उन लोगों से ही जिंदगी की पहली कमाई का सिलसिला आरंभ हुआ। फोटोग्राफी का व्यापार आरंभ हो गया। और धीरे धीरे इसका विस्तार करते हुए उन्होंने एक विश्व रेकार्ड 12 घंटे में 100 मॉडल्स के 10000 फोटो खींच कर लिम्का बुक्स में अपना नाम दर्ज कर लिया। इस रेकार्ड के बाद उनके पास काम की तादाद और ज्यादा बढ़ने लगी।
*संदीप माहेश्वरी की इमेजबाजार कंपनी:*
लिमका बुक में नाम दर्ज करने के बाद उनको काफी व्यवसाय मिलने लगा। इसी रेकार्ड के कारण उनके पास कई मॉडल्स और विज्ञापन कंपनियां आने लगी, और देखते ही देखते कुछ ही अवधि में उनकी कम्पनी भारत की बड़ी फोटोग्राफी एजेंसी बन गयी। पैसों की कोई कमी नहीं रही। 2006 में संदीप के दिमाग में एक नया ख्याल आया और उसी ख्याल से उपजा ऑनलाइन इमेज बाजार शेयरिंग साईट। ये देश की सबसे बड़ी ऑनलाइन फोटोग्राफी की कम्पनी है। अभी उनके पास 45 देशों से लगभग 7000 से ज्यादा क्लाईंट है। अब संदीप भी शेयरिंग पर सेमिनार देते हैं और लाखों युवाओं को प्रेरित करते हैं।
*संदीप के जीवन की महत्वपूर्ण वर्ष:*
2000 बिना किसी स्टूडियो के फोटोग्राफी का कार्य आरंभ।
• 2001 अपना कैमरा बेच दिया और जापानी कंपनी में काम करने लगे।
• 2002 कुछ मित्रों के साथ नयी कंपनी बनाई, लेकिन कुछ ही दिनों के बाद ये कंपनी बंद हो गई।
• 2003 मार्केटिंग को लेकर एक किताब लिखी, कंसलटेन्सी फार्म की स्थापना की, फिर असफल हो गये।
• फोटोग्राफी में लिमका बुक में रेकार्ड दर्ज किया।
• 2004 छोटा स्टूडियो लेकर एक फर्म की स्थापना की।
• 2005 फोटोग्राफी वेबसाईट का नया आइडिया आया और उस पर काम करने लगे।
• 2006 imagesbazaar.com को लांच किया, सिर्फ 8,000 तस्वीरें थी और कुछ फोटोग्राफर शामिल थे। इसके बाद संदीप ने पीछे मुड़कर नही देखा।
*संदीप महेश्वरी की सफलता और पुरस्कार:*
• उन्हें क्रिएटिव एंतोप्रेन्टोरिय़र ऑफ द ईयर 2013 का पुरस्कार “Entrepreneur India Summit” के द्वारा 2014 में प्रदान किया गया।
• “Business World” पत्रिका ने उन्हें शीर्ष उद्ममी के रूप में चुना गया।
• ग्लोबल मार्केटिंग फोरम के द्वारा स्टार यूथ एचिहिवर के रूप में चुना गया।
• ब्रिटिश हाई कमीशन की तरफ से इन्हे युवा उद्यमी का पुरस्कार मिला
• ईटी नाउ चैनल के द्वारा शीर्ष उद्यमी का पुरस्कार मिला।
• इसके साथ साथ कई चैनलों ने इन्हें वर्ष का उद्यमी घोषित किया।
*संदीप माहेश्वरी के अनमोल वचन:*
संदीप का मानना है कि हर किसी के अंदर उसका गुरू रहता है। सही समय पर आप उस गुरू की अनुभूति कीजिए। संदीप अब युवाओं के लिए गुरू की तरह है। लोग उनके द्वारा कहे गये शब्दों को ध्यान से सुनते है और अपने जीवन में लाने की कोशिश भी करते हैं।
संदीप के जीवन का सबसे बड़ा शब्द है
‘आसान’।
उनका मानना है जीवन में कुछ भी कठिन नहीं है, सभी कुछ आसान है। सिर्फ पूरी शिद्दत से आप खुद के लक्ष्य के पीछे लगे रहिए।
*वे कहते हैं:*
• ‘यदि आपके पास चीजों का आधिक्य है तो आप उसे सिर्फ अपने लिए ही संरक्षित ना रखें, उसे जरूरतमंदों के साथ शेयर करें।’
• सभी से सीखो पर सबका अनुसरण मत करो।
• मनुष्य की सबसे संरचनात्मक और विनाशात्मक चीज है उसकी लालसा।
• ना भागना है, ना रूकना है, बस चलते जाना है। पैसे की उतनी ही जरूरत है जितना गाड़ी में पेट्रोल
• जब भी कठिनाइयों से डरो तो अपने से नीचे के लोगों को देखो।
दशरथ मांझी – द माउंटेन मैन || Dasharatha Manjhi - The Mountain Man
*दशरथ मांझी – द माउंटेन मैन*
दशरथ मांझी उर्फ़ माउंटेन मैन को आज हर कोई जानता है, कुछ समय पहले आई फिल्म मांझी के द्वारा हर कोई इनके जीवन को करीब से जान पाया है| बिहार के छोटे से गाँव गहलौर का रहने वाला दशरथ ने इतना आश्चर्यजनक कार्य किया है, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था| इन्होंने अपने छोटे से गाँव से शहर तक का रास्ता बनाने के लिए 360 फीट लम्बे, 30 फीट चौड़े व 25 फीट ऊँचे पहाड़ को तोड़ डाला व रास्ता बना दिया|
*जन्म से लेकर जवानी तक का सफ़र:*
दशरथ का जब जन्म हुआ, तब देश अंग्रेजो का गुलाम था, पूरे देश के साथ साथ इस गावं के भी बत्तर हालात थे| 1947 में देश तो आजाद हो जाता है, लेकिन इसके बाद धनि लोगों की गिरफ्त में चला जाता है| हर तरफ अमीर जमीदार अपना हक जमाये रहते हैं और बिना पढ़े लिखे गरीबो को परेशान करते हैं। दशरथ का परिवार भी बहुत गरीब था, एक एक वक्त की रोटी के लिए उसके पिता बहुत मेहनत करते थे।
दशरथ का बाल विवाह भी हुआ था। आजादी मिलने के बाद भी गहलौर गाँव में ना बिजली थी, ना पानी और ना ही पक्की सड़क। उस गाँव के लोगों को पानी के लिए दूर जाना होता था, यहाँ तक की अस्पताल के लिए भी पहाड़ चढ़ कर शहर जाना होता था, जिसमें बहुत समय भी लगता था।
दशरथ के पिता ने गाँव के जमीदार से पैसे लिए थे, जिसे वह लौटा नहीं पाये थे। बदले में वह अपने बेटे को उस जमीदार का बधुआ मजदूर बनने को बोलता है। किसी की गुलामी दशरथ को पसंद नहीं थी, इसलिए वह यह गाँव छोड़कर भाग जाता है। अपने गाँव से दूर वह धनवाद में कोयले की खदान में काम करने लगता है। 7 साल तक वहां रहने के बाद उसे अपने परिवार की याद सताने लगती है और फिर वह गाँव लौट आता है।
1955 के लगभग जब वह गाँव लौटता है, तब भी वहां कुछ नहीं बदलता है। वहां अभी भी, गरीबी, जमीदारी, होती है, वहां ना सड़क, ना बिजली जैसी सुविधा पहुँच पाती है। दशरथ के इस गाँव में छुआ छूत जैसी कुप्रथा भी रहती है। दशरथ की माँ अब तक गुजर चुकी होती है, अपने पिता के साथ वह जीवन बसर करने लगता है। तभी उसे एक लड़की पसंद आती है, ये वही लड़की होती है जिससे उसकी बचपन में शादी होती है। मगर अब लड़की का पिता उसकी बचपन की शादी को नहीं मानता है, क्यूंकि उसके हिसाब से दशरथ कुछ काम धाम नहीं करता है। अपने प्यार की खातिर वह फगुनिया को भगा के ले आता है। दोनों एक अच्छे पति पत्नी की तरह जीवन बिताने लगते है। दशरथ को एक बेटा भी होता है।
1960 में दशरथ की पत्नी एक बार फिर गर्भवती होती है, इस समय दशरथ को पहाड़ के उस पार कुछ काम मिल जाता है। फगुनिया रोज उसे खाना देने जाती है, एक दिन अचानक उसका पैर फिसल जाता है और वह गिर जाती है। दशरथ के गावं में कोई अस्पताल ना होने के कारण वह बड़ी मुश्किल से पहाड़ चढ़ के उसे शहर ले जाता है। जहाँ वह एक लड़की को जन्म देती है लेकिन खुद मर जाती है।
दशरथ इस बात से बहुत आहात होता है और फगुनिया से वादा करता है कि वह इस पहाड़ को तोड़ रास्ता जरुर बनाएगा। 1960 से शुरू हुआ दशरथ का यह प्रण एक हथोड़ी के सहारे था।
*दशरथ मांझी – द माउंटेन मैन कहानी:*
रोज सुबह उठकर दशरथ अपना हथोड़ा उठाये पहाड़ तोड़ने निकल जाता था। वह ऐसे काम करता जैसे उसे इसके पैसे मिलते हो। सब उसे पागल सनकी कहते, लेकिन वह किसी की ना सुनता। इसी वजह से सब उसे पहाड़तोडू कहने लगे थे।
दशरथ के पिता उसे बहुत समझाते थे कि ऐसा करने से उसके बच्चों का पेट कैसे भरेगा, लेकिन वह नहीं सुनता था। किसी तरह कुछ पैसा कमाकर बच्चों का पेट भी भर देता था।
ऐसा करते करते कई साल बीत गए और गाँव में सुखा पड़ जाता है, सब गाँव छोड़ कर जाने लगते है, लेकिन दशरथ नहीं जाता, वह अपने पिता और बच्चों को भेज देता है। इस सूखे की मार में दशरथ को गन्दा पानी व पत्तियां खा कर गुजारा करना पड़ता है।
समय के साथ सूखे के दिन बीत जाते है और सब गाँव वाले लौट आते है। अब भी सब दशरथ को पहाड़ तोड़ता देख आशचर्य चकित हो जाते है।
*1975 – आपातकाल का समय:*
1975 में इंदिरा गाँधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी में पूरा देश प्रभावित हुआ था। सब जगह हाहाकार मचा था। अपनी एक रैली में इंदिरा गाँधी बिहार पहुँचती है, जहाँ दशरथ भी जाता है। भाषण के दौरान स्टेज टूट जाता है जिसे दशरथ और कुछ लोग मिलकर संभाल लेते है, जिससे इंदिरा गाँधी अपना भाषण पूरा कर पाती है, इसके बाद दशरथ उनके साथ एक फोटो खिंचवाता है। जब यह बात वहां के जमीदार को पता चलती है, तो वह उसे अपनी मीठी बात में फंसाता है कि वह उसकी मदद करेगा सरकार से सड़क के लिए पैसे मांगने में, अनपढ़ दशरत उसकी बातों में आकर अगूंठा लगा देता है। लेकिन जब दशरत को इस बात का पता चलता है कि जमीदार ने उससे 25 लाख का चुना लगाया है, तो वह इसकी शिकायत प्रधानमंत्री से करने की ठान लेता है।
*बिहार से दिल्ली:*
दशरथ के पास 20 रूपए भी नहीं होते है ट्रेन के, जिस वजह से टीटी उसे ट्रेन से उतार देता है। लेकिन यह बात दशरत को रोक नहीं पाती और वह पैदल ही निकल पड़ता है।
दिल्ली में उस समय इमरजेंसी के चलते बहुत दंगे हो रहे होते है, दशरत जब पुलिस को अपनी इंदिरा गाँधी के साथ फोटो दिखाता है, तब उसे फाड़ कर वे उसे भगा देते है और प्रधान मंत्री से मिलने नहीं देते है।
*बिहार लौट आना:*
थक हार कर दशरत अपने घर लौट आता है, उसकी सारी उम्मीद टूट चुकी होती है, वह अब काफी बुढा भी हो गया होता है, उसकी हिम्मत जवाब देने लगती है। लेकिन कुछ लोग दशरथ का साथ देने के लिए आगे आते है और पहाड़ तोड़ने में मदद करते है। ये बात जब जमीदार को पता चलती है, तो वह उन सबको मार डालने की धमकी देता है और कुछ को गिरफ्तार करा देता है। लेकिन एक पत्रकार दशरथ के लिए मसीहा बन कर आता है और वह उसके लिए खड़े होता है। वह सभी गाँव वालों के साथ मिल कर दशरथ के लिए पुलिस स्टेशन के सामने विरोध करता है। दशरत को छोड़ दिया जाता है।
*1982 मे प्राप्त सफलता:*
360 फीट लम्बे, 30 फीट चौड़े व 25 फीट ऊँचे पहाड़ को दशरथ तोड़ने में सफल हो जाता है। 55 km लम्बे रास्ते को वह 15 km के रास्ते में बदल देता है। दशरत मांझी की बदौलत ही सरकार उस जगह पर ध्यान देती है और कार्य शुरू होता है।
1982 में दशरत की मेहनत रंग लाती है और पहाड़ टूट कर रास्ता बन जाता है।
2006 में दशरथ का नाम पद्म श्री के लिए दिया गया था।
*2007 म्रत्यु:*
17 अगस्त 2007 को दशरत की गाल ब्लाडर में कैंसर होने की वजह से दिल्ली में म्रत्यु हो जाती है।
मरने से पहले दशरत अपने जिंदगी पर फिल्म बनाने की अनुमति देकर जाता है। वह चाहता था उसकी यह कहानी से दुसरे भी प्रभावित होयें। बिहार सरकार ने इसके मरने पर राज्य शोक घोषित किया था।
2011 में उस सड़क को दशरथ मांझी पथ नाम दिया गया। ऐसे लोगों से हमें ज़िन्दगी में कभी हार ना मानने की शिक्षा मिलती है। दशरथ मांझी को हम सबका सलाम है।
*2007 म्रत्यु:*
17 अगस्त 2007 को दशरत की गाल ब्लाडर में कैंसर होने की वजह से दिल्ली में म्रत्यु हो जाती है।
मरने से पहले दशरत अपने जिंदगी पर फिल्म बनाने की अनुमति देकर जाता है। वह चाहता था उसकी यह कहानी से दुसरे भी प्रभावित होयें। बिहार सरकार ने इसके मरने पर राज्य शोक घोषित किया था।
2011 में उस सड़क को दशरथ मांझी पथ नाम दिया गया। ऐसे लोगों से हमें ज़िन्दगी में कभी हार ना मानने की शिक्षा मिलती है। दशरथ मांझी को हम सबका सलाम है।
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Safalta Aapki
मेरी कोम || Mary Com
*मेरी कोम*
एक महिला खिलाड़ी जिन्होंने अपनी महान उपलब्धियों से भारत को गौरवान्वित किया है, ऐसी महान महिला का नाम है मेरी कोम, जो एक अकेली भारतीय महिला बॉक्सर है।
मेरी ने 2012 में हुए ओलंपिक में क्वालीफाई किया था, और ब्रोंज मैडल हासिल किया था। पहली बार कोई भारतीय बॉक्सर महिला यहाँ तक पहुंची थी। इसके अलावा वे 5 बार वर्ल्ड बॉक्सर चैम्पियनशीप जीत चुकी है।
मेरी ने अपने बॉक्सिंग करियर की शुरुवात 18 साल की उम्र में ही कर दी थी। मेरी कोम समस्त भारत के लिए प्रेरणा स्त्रोत है, इनका जीवन कई उतार चढ़ाव से भरा हुआ रहा। बॉक्सिंग में करियर बनाने के लिए इन्होने बहुत मेहनत की और अपने परिवार तक से लड़ बैठी थी।
*मेरी कोम का जीवन परिचय:*
मेरी कोम का पुरा नाम मांगते चुंगनेजंग मेरी कोम है। मेरी कोम का जन्म 1 मार्च 1983 में कन्गथेइ, मणिपुरी, भारत में हुआ था। इनके पिता एक गरीब किसान थे। ये चार भाई बहनों में सबसे बड़ी थी, कम उम्र से ही मेरी बहुत मेहनती रही है, अपने माता पिता की मदद करने के लिए वे भी उनके साथ काम करती थी। साथ ही वे अपने भाई बहनों की देखभाल करती थी।
मेरी ने इन सब के बाद भी पढाई की और इसकी शुरुवात ‘लोकटक क्रिस्चियन मॉडल हाई स्कूल’ से की, जहाँ वे 6th तक पढ़ी। इसके बाद संत ज़ेवियर कैथोलिक स्कूल चली गई, जहाँ से इन्होने कक्षा आठवीं की परीक्षा पास की। आगे की पढाई 9th and 10th के लिए वे आदिमजाति हाई स्कूल चली गई, किन्तु वे परीक्षा में पास नहीं हो पाई। स्कूल की पढाई मेरी ने बीच में ही छोड़ दी और आगे उन्होंने NIOS की परीक्षा दी। इसके बाद इन्होंने अपना ग्रेजुएशन चुराचांदपुर कॉलेज, इम्फाल (मणिपुर की राजधानी) से किया।
मेरी को बचपन से ही एथलीट बनने का शौक रहा, स्कूल के समय में वे फुटबॉल जैसे में हिस्सा लेती थी। लेकिन मजाक की बात यह है कि उन्होंने बॉक्सिंग में कभी भाग नहीं लिया था। सन 1998 में बॉक्सर ‘डिंगको सिंह’ ने एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल जीता, वे मणिपुर के थे।
उनकी इस जीत से उनकी पूरी मातृभूमि झूम उठी थी। यहाँ मेरी ने बॉक्सिंग करते हुए डिंगको को देखा, और इसे अपना करियर बनाने की ठान ली। इसके बाद उनके सामने पहली चुनौती थी, अपने घर वालों को इसके लिए राजी करना। छोटी जगह के साधारण से ये लोग, बॉक्सिंग को पुरुषों का खेल समझते थे, और उन्हें लगता था इस तरह के गेम में बहुत ताकत मेहनत लगती है, जो इस कम उम्र की लड़की के लिए ठीक नहीं है।
मेरी ने मन में ठान लिया था कि वे अपने लक्ष्य तक जरुर पहुंचेंगी, चाहे इसके लिए उन्हें कुछ भी क्यों न करना पड़े। मेरी ने अपने माँ बाप को बिना बताये इसके लिए ट्रेनिंग शुरू कर दी। एक बार इन्होने ‘खुमान लम्पक स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स’ में लड़कियों को लड़कों से बॉक्सिंग करते देखा, जिसे देख वे स्तब्ध रे गई। यहाँ से उनके मन में उनके सपने को लेकर विचार और परिपक्व हो गए।
वे अपने गाँव से इम्फाल गई और मणिपुर राज्य के बॉक्सिंग कोच एम् नरजीत सिंह से मिली और उन्हें ट्रेनिंग देने के लिए निवेदन किया। वे इस खेल के प्रति बहुत भावुक थी, साथ वे एक जल्दी सिखने वाली विद्यार्थी थी। ट्रेनिंग सेंटर से जब सब चले जाते थे, तब भी वे देर रात तक प्रैक्टिस करती रहती थी।
*मेरी कॉम का करियर:*
बॉक्सिंग शुरू करने के बाद मेरी को पता था कि उनका परिवार उनके बॉक्सिंग में करियर बनाने के विचार को कभी नहीं मानेगा, जिस वजह से उन्होंने इस बात को अपने परिवार से छुपा कर रखा था। 1998 से 2000 तक वे अपने घर में बिना बताये इसकी ट्रेनिंग लेती रही। सन 2000 में जब मेरी ने ‘वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप, मणिपुर’ में जीत हासिल की, और इन्हें बॉक्सर का अवार्ड मिला, तो वहां के हर एक समाचार पत्र में उनकी जीत की बात छपी, तब उनके परिवार को भी उनके बॉक्सर होने का पता चला।
इस जीत के बाद उनके घर वालों ने भी उनकी इस जीत को सेलिब्रेट किया। इसके बाद मेरी ने पश्चिम बंगाल में आयोजित ‘वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ में गोल्ड मैडल जीत, अपने राज्य का नाम ऊँचा किया।
• 2001 – सन 2001 में मेरी ने अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपना करियर शुरू किया। इस समय इनकी उम्र 18 साल मात्र थी। सबसे पहले इन्होने अमेरिका में आयोजित AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप, 48 kg वेट केटेगरी में हिस्सा लिया और यहाँ सिल्वर मैडल जीता।
• सन 2002 में तुर्की में आयोजित AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप, 45 kg वेट केटेगरी में मेरी विजयी रहीं और इन्होने गोल्ड मैडल अपने नाम किया। इसी साल मेरी ने हंगरी में आयोजित ‘विच कप’ में 45 वेट केटेगरी में भी गोल्ड मैडल जीता।
• 2003 – सन 2003 में भारत में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ में 46 kg वेट केटेगरी में मेरी ने गोल्ड मैडल जीता। इसके बाद नॉर्वे में आयोजित ‘वीमेन बॉक्सिंग वर्ल्ड कप’ में एक बार फिर मेरी को गोल्ड मैडल मिला।
• 2005 – सन 2005 में ताइवान में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ 46 kg वेट क्लास में मेरी को फिर से गोल्ड मैडल मिला। इसी साल रसिया में मेरी ने AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप भी जीती।
• 2006 – सन 2006 में डेनमार्क में आयोजित ‘वीनस वीमेन बॉक्स कप’ एवं भारत में आयोजित AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप में मेरी ने जीत हासिल कर, गोल्ड मैडल जीता।
• 2008 – एक साल का ब्रेक लेकर मेरी 2008 में फिर वापस आई और भारत में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ में सिल्वर मैडल जीता। इसके साथ ही AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप चाइना में गोल्ड मैडल जीता।
• 2009 – सन 2009 में वियतनाम में आयोजित ‘एशियन इंडोर गेम्स’ में मेरी ने गोल्ड मैडल जीता।
• 2010 – सन 2010 कजाखस्तान में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ में मेरी ने गोल्ड मैडल जीता, इसके साथ ही मेरी ने लगातार पाचंवी बार AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप में गोल्ड मैडल जीता। इसी साल मेरी ने एशियन गेम्स में 51 kg वेट क्लास में हिस्सा लेकर ब्रोंज मैडल जीता था। 2010 में भारत में कॉमनवेल्थ गेम्स का भी आयोजन हुआ था, यहाँ ओपनिंग सेरेमनी में विजेंदर सिंह के साथ मेरी कोम भी उपस्थित थी। इस गेम्स में वीमेन बॉक्सिंग गेम का आयोजन नहीं था, जिस वजह से मेरी यहाँ अपनी प्रतिभा नहीं दिखा सकीं।
• 2011 – सन 2011 में चाइना में आयोजित ‘एशियन वीमेन कप’ 48 kg वेट क्लास में गोल्ड मैडल जीता।
• 2012 – सन 2012 में मोंगोलिया में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ 51 kg वेट क्लास में गोल्ड मैडल जीता। इस साल लन्दन में आयोजित ओलंपिक में मेरी को बहुत सम्मान मिला, वे पहली महिला बॉक्सर थी जो ओलंपिक के लिए क्वालिफाइड हुई थी। यहाँ मेरी को 51 kg वेट क्लास में ब्रोंज मैडल मिला था। इसके साथ मेरी तीसरी भारतीय महिला थी, जिन्हें ओलंपिक में मैडल मिला था।
• 2014 – सन 2014 में साउथ कोरिया में आयोजित एशियन गेम्स में वीमेन फ्लाईवेट (48-52kg) में मेरी गोल्ड मैडल जीता और इतिहास रच दिया।
*मेरी कोम पर्सनल लाइफ:*
मेरी की मुलाकात सन 2001 में ओन्लर से दिल्ली में हुई थी, जब वे पंजाब में नेशनल गेम्स के लिए जा रही थी। उस समय ओन्लर दिल्ली यूनिवर्सिटी में लॉ पढ़ रहे थे। दोनों एक दुसरे से बहुत प्रभावित हुए, चार साल तक दोनों के बीच दोस्ती का रिश्ता रहा, जिसके बाद सन 2005 में दोनों ने शादी कर ली। दोनों के तीन लड़के है, जिसमें से 2 जुड़वाँ बेटों का जन्म 2007 में हुआ था, एवं एक और बेटे का जन्म 2013 में हुआ।
*मेरी कॉम अवार्ड्स एवं अचीवमेंट:*
• सन 2003 में अर्जुन अवार्ड मिला।
• सन 2006 पद्म श्री अवार्ड मिला।
• सन 2007 में खेल के सबसे बड़े सम्मान ‘ राजीव गाँधी खेल रत्न’ के लिए नोमिनेट किया गया।
• सन 2007 में लिम्का बुक रिकॉर्ड द्वारा पीपल ऑफ़ दी इयर का सम्मान मिला।
• सन 2008 में CNN-IBN एवं रिलायंस इंडस्ट्री द्वारा ‘रियल हॉर्स अवार्ड’ से सम्मानित किया गया
• सन 2008 पेप्सी MTV यूथ आइकॉन
• सन 2008 में AIBA द्वारा ‘मैग्निफिसेंट मैरी’ अवार्ड।
• 2009 में राजीव गाँधी खेल रत्न दिया गया।
• सन 2010 में सहारा स्पोर्ट्स अवार्ड द्वारा स्पोर्ट्सवीमेन ऑफ़ दी इयर का अवार्ड दिया गया।
• सन 2013 में देश के तीसरे बड़े सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
*मेरी कोम फिल्म:*
मेरी कोम के जीवन पर आधारित फिल्म ‘मेरी कोम’ को ओमंग कुमार ने बनाया था, जिसे 5 सितम्बर 2014 में रिलीज़ किया गया था। फिल्म में मुख्य भूमिका में प्रियंका चोपड़ा थी, जिसमें उनकी अदाकारी देखने लायक थी।
एक महिला खिलाड़ी जिन्होंने अपनी महान उपलब्धियों से भारत को गौरवान्वित किया है, ऐसी महान महिला का नाम है मेरी कोम, जो एक अकेली भारतीय महिला बॉक्सर है।
मेरी ने 2012 में हुए ओलंपिक में क्वालीफाई किया था, और ब्रोंज मैडल हासिल किया था। पहली बार कोई भारतीय बॉक्सर महिला यहाँ तक पहुंची थी। इसके अलावा वे 5 बार वर्ल्ड बॉक्सर चैम्पियनशीप जीत चुकी है।
मेरी ने अपने बॉक्सिंग करियर की शुरुवात 18 साल की उम्र में ही कर दी थी। मेरी कोम समस्त भारत के लिए प्रेरणा स्त्रोत है, इनका जीवन कई उतार चढ़ाव से भरा हुआ रहा। बॉक्सिंग में करियर बनाने के लिए इन्होने बहुत मेहनत की और अपने परिवार तक से लड़ बैठी थी।
*मेरी कोम का जीवन परिचय:*
मेरी कोम का पुरा नाम मांगते चुंगनेजंग मेरी कोम है। मेरी कोम का जन्म 1 मार्च 1983 में कन्गथेइ, मणिपुरी, भारत में हुआ था। इनके पिता एक गरीब किसान थे। ये चार भाई बहनों में सबसे बड़ी थी, कम उम्र से ही मेरी बहुत मेहनती रही है, अपने माता पिता की मदद करने के लिए वे भी उनके साथ काम करती थी। साथ ही वे अपने भाई बहनों की देखभाल करती थी।
मेरी ने इन सब के बाद भी पढाई की और इसकी शुरुवात ‘लोकटक क्रिस्चियन मॉडल हाई स्कूल’ से की, जहाँ वे 6th तक पढ़ी। इसके बाद संत ज़ेवियर कैथोलिक स्कूल चली गई, जहाँ से इन्होने कक्षा आठवीं की परीक्षा पास की। आगे की पढाई 9th and 10th के लिए वे आदिमजाति हाई स्कूल चली गई, किन्तु वे परीक्षा में पास नहीं हो पाई। स्कूल की पढाई मेरी ने बीच में ही छोड़ दी और आगे उन्होंने NIOS की परीक्षा दी। इसके बाद इन्होंने अपना ग्रेजुएशन चुराचांदपुर कॉलेज, इम्फाल (मणिपुर की राजधानी) से किया।
मेरी को बचपन से ही एथलीट बनने का शौक रहा, स्कूल के समय में वे फुटबॉल जैसे में हिस्सा लेती थी। लेकिन मजाक की बात यह है कि उन्होंने बॉक्सिंग में कभी भाग नहीं लिया था। सन 1998 में बॉक्सर ‘डिंगको सिंह’ ने एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल जीता, वे मणिपुर के थे।
उनकी इस जीत से उनकी पूरी मातृभूमि झूम उठी थी। यहाँ मेरी ने बॉक्सिंग करते हुए डिंगको को देखा, और इसे अपना करियर बनाने की ठान ली। इसके बाद उनके सामने पहली चुनौती थी, अपने घर वालों को इसके लिए राजी करना। छोटी जगह के साधारण से ये लोग, बॉक्सिंग को पुरुषों का खेल समझते थे, और उन्हें लगता था इस तरह के गेम में बहुत ताकत मेहनत लगती है, जो इस कम उम्र की लड़की के लिए ठीक नहीं है।
मेरी ने मन में ठान लिया था कि वे अपने लक्ष्य तक जरुर पहुंचेंगी, चाहे इसके लिए उन्हें कुछ भी क्यों न करना पड़े। मेरी ने अपने माँ बाप को बिना बताये इसके लिए ट्रेनिंग शुरू कर दी। एक बार इन्होने ‘खुमान लम्पक स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स’ में लड़कियों को लड़कों से बॉक्सिंग करते देखा, जिसे देख वे स्तब्ध रे गई। यहाँ से उनके मन में उनके सपने को लेकर विचार और परिपक्व हो गए।
वे अपने गाँव से इम्फाल गई और मणिपुर राज्य के बॉक्सिंग कोच एम् नरजीत सिंह से मिली और उन्हें ट्रेनिंग देने के लिए निवेदन किया। वे इस खेल के प्रति बहुत भावुक थी, साथ वे एक जल्दी सिखने वाली विद्यार्थी थी। ट्रेनिंग सेंटर से जब सब चले जाते थे, तब भी वे देर रात तक प्रैक्टिस करती रहती थी।
*मेरी कॉम का करियर:*
बॉक्सिंग शुरू करने के बाद मेरी को पता था कि उनका परिवार उनके बॉक्सिंग में करियर बनाने के विचार को कभी नहीं मानेगा, जिस वजह से उन्होंने इस बात को अपने परिवार से छुपा कर रखा था। 1998 से 2000 तक वे अपने घर में बिना बताये इसकी ट्रेनिंग लेती रही। सन 2000 में जब मेरी ने ‘वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप, मणिपुर’ में जीत हासिल की, और इन्हें बॉक्सर का अवार्ड मिला, तो वहां के हर एक समाचार पत्र में उनकी जीत की बात छपी, तब उनके परिवार को भी उनके बॉक्सर होने का पता चला।
इस जीत के बाद उनके घर वालों ने भी उनकी इस जीत को सेलिब्रेट किया। इसके बाद मेरी ने पश्चिम बंगाल में आयोजित ‘वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ में गोल्ड मैडल जीत, अपने राज्य का नाम ऊँचा किया।
• 2001 – सन 2001 में मेरी ने अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपना करियर शुरू किया। इस समय इनकी उम्र 18 साल मात्र थी। सबसे पहले इन्होने अमेरिका में आयोजित AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप, 48 kg वेट केटेगरी में हिस्सा लिया और यहाँ सिल्वर मैडल जीता।
• सन 2002 में तुर्की में आयोजित AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप, 45 kg वेट केटेगरी में मेरी विजयी रहीं और इन्होने गोल्ड मैडल अपने नाम किया। इसी साल मेरी ने हंगरी में आयोजित ‘विच कप’ में 45 वेट केटेगरी में भी गोल्ड मैडल जीता।
• 2003 – सन 2003 में भारत में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ में 46 kg वेट केटेगरी में मेरी ने गोल्ड मैडल जीता। इसके बाद नॉर्वे में आयोजित ‘वीमेन बॉक्सिंग वर्ल्ड कप’ में एक बार फिर मेरी को गोल्ड मैडल मिला।
• 2005 – सन 2005 में ताइवान में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ 46 kg वेट क्लास में मेरी को फिर से गोल्ड मैडल मिला। इसी साल रसिया में मेरी ने AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप भी जीती।
• 2006 – सन 2006 में डेनमार्क में आयोजित ‘वीनस वीमेन बॉक्स कप’ एवं भारत में आयोजित AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप में मेरी ने जीत हासिल कर, गोल्ड मैडल जीता।
• 2008 – एक साल का ब्रेक लेकर मेरी 2008 में फिर वापस आई और भारत में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ में सिल्वर मैडल जीता। इसके साथ ही AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप चाइना में गोल्ड मैडल जीता।
• 2009 – सन 2009 में वियतनाम में आयोजित ‘एशियन इंडोर गेम्स’ में मेरी ने गोल्ड मैडल जीता।
• 2010 – सन 2010 कजाखस्तान में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ में मेरी ने गोल्ड मैडल जीता, इसके साथ ही मेरी ने लगातार पाचंवी बार AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप में गोल्ड मैडल जीता। इसी साल मेरी ने एशियन गेम्स में 51 kg वेट क्लास में हिस्सा लेकर ब्रोंज मैडल जीता था। 2010 में भारत में कॉमनवेल्थ गेम्स का भी आयोजन हुआ था, यहाँ ओपनिंग सेरेमनी में विजेंदर सिंह के साथ मेरी कोम भी उपस्थित थी। इस गेम्स में वीमेन बॉक्सिंग गेम का आयोजन नहीं था, जिस वजह से मेरी यहाँ अपनी प्रतिभा नहीं दिखा सकीं।
• 2011 – सन 2011 में चाइना में आयोजित ‘एशियन वीमेन कप’ 48 kg वेट क्लास में गोल्ड मैडल जीता।
• 2012 – सन 2012 में मोंगोलिया में आयोजित ‘एशियन वीमेन बॉक्सिंग चैम्पियनशीप’ 51 kg वेट क्लास में गोल्ड मैडल जीता। इस साल लन्दन में आयोजित ओलंपिक में मेरी को बहुत सम्मान मिला, वे पहली महिला बॉक्सर थी जो ओलंपिक के लिए क्वालिफाइड हुई थी। यहाँ मेरी को 51 kg वेट क्लास में ब्रोंज मैडल मिला था। इसके साथ मेरी तीसरी भारतीय महिला थी, जिन्हें ओलंपिक में मैडल मिला था।
• 2014 – सन 2014 में साउथ कोरिया में आयोजित एशियन गेम्स में वीमेन फ्लाईवेट (48-52kg) में मेरी गोल्ड मैडल जीता और इतिहास रच दिया।
*मेरी कोम पर्सनल लाइफ:*
मेरी की मुलाकात सन 2001 में ओन्लर से दिल्ली में हुई थी, जब वे पंजाब में नेशनल गेम्स के लिए जा रही थी। उस समय ओन्लर दिल्ली यूनिवर्सिटी में लॉ पढ़ रहे थे। दोनों एक दुसरे से बहुत प्रभावित हुए, चार साल तक दोनों के बीच दोस्ती का रिश्ता रहा, जिसके बाद सन 2005 में दोनों ने शादी कर ली। दोनों के तीन लड़के है, जिसमें से 2 जुड़वाँ बेटों का जन्म 2007 में हुआ था, एवं एक और बेटे का जन्म 2013 में हुआ।
*मेरी कॉम अवार्ड्स एवं अचीवमेंट:*
• सन 2003 में अर्जुन अवार्ड मिला।
• सन 2006 पद्म श्री अवार्ड मिला।
• सन 2007 में खेल के सबसे बड़े सम्मान ‘ राजीव गाँधी खेल रत्न’ के लिए नोमिनेट किया गया।
• सन 2007 में लिम्का बुक रिकॉर्ड द्वारा पीपल ऑफ़ दी इयर का सम्मान मिला।
• सन 2008 में CNN-IBN एवं रिलायंस इंडस्ट्री द्वारा ‘रियल हॉर्स अवार्ड’ से सम्मानित किया गया
• सन 2008 पेप्सी MTV यूथ आइकॉन
• सन 2008 में AIBA द्वारा ‘मैग्निफिसेंट मैरी’ अवार्ड।
• 2009 में राजीव गाँधी खेल रत्न दिया गया।
• सन 2010 में सहारा स्पोर्ट्स अवार्ड द्वारा स्पोर्ट्सवीमेन ऑफ़ दी इयर का अवार्ड दिया गया।
• सन 2013 में देश के तीसरे बड़े सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
*मेरी कोम फिल्म:*
मेरी कोम के जीवन पर आधारित फिल्म ‘मेरी कोम’ को ओमंग कुमार ने बनाया था, जिसे 5 सितम्बर 2014 में रिलीज़ किया गया था। फिल्म में मुख्य भूमिका में प्रियंका चोपड़ा थी, जिसमें उनकी अदाकारी देखने लायक थी।
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