Tuesday, 1 March 2016

जिसने कभी हार ना मानी मिल्खा सिंह


मिल्खा सिंह
जन्म: 20 नवम्बर 1929, गोविन्दपुरा (पाकिस्तान)कार्य क्षेत्र: पूर्व 400 मीटर धावकउपलब्धियां: 1958 के एशियाई खेलों में 200 मी व 400 मी में स्वर्ण पदक, 1958 के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक, 1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदकमिलखा सिंह आज तक भारत के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित धावक हैं। इन्होने रोम के 1960 ग्रीष्म ओलंपिक और टोक्यो के 1964 ग्रीष्म ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व किया था। उनको “उड़न सिख” का उपनाम दिया गया था। 1960 के रोम ओलंपिक खेलों में उन्होंने पूर्व ओलंपिक कीर्तिमान को ध्वस्त किया लेकिन पदक से वंचित रह गए। इस दौड़ के दौरान उन्होंने ऐसा राष्ट्रिय कीर्तिमान स्थापित किया जो लगभग 40 साल बाद जाकर टूटा।प्रारंभिक जीवन मिल्खा सिंह का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब में एक सिख राठौर परिवार में 20 नवम्बर 1929 को हुआ था। अपने माँ-बाप की कुल 15 संतानों में वह एक थे। उनके कई भाई-बहन बाल्यकाल में ही गुजर गए थे। भारत के विभाजन के बाद हुए दंगों में मिलखा सिंह ने अपने माँ-बाप और भाई-बहन खो दिया। अंततः वे शरणार्थी बन के ट्रेन द्वारा पाकिस्तान से दिल्ली आए। दिल्ली में वह अपनी शदी-शुदा बहन के घर पर कुछ दिन रहे। कुछ समय शरणार्थी शिविरों में रहने के बाद वह दिल्ली के शाहदरा इलाके में एक पुनर्स्थापित बस्ती में भी रहे।ऐसे भयानक हादसे के बाद उनके ह्रदय पर गहरा आघात लगा था। अपने भाई मलखान के कहने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया और चौथी कोशिश के बाद सन 1951 में सेना में भर्ती हो गए। बचपन में वह घर से स्कूल और स्कूल से घर की 10 किलोमीटर की दूरी दौड़ कर पूरी करते थे और भर्ती के वक़्त क्रॉस-कंट्री रेस में छठे स्थान पर आये थे इसलिए सेना ने उन्हें खेलकूद में स्पेशल ट्रेनिंग के लिए चुना था।
धावक के तौर पर करियर
सेना में उन्होंने कड़ी मेहनत की और 200 मी और 400 मी में अपने आप को स्थापित किया और कई प्रतियोगिताओं में सफलता हांसिल की। उन्होंने सन 1956 के मेर्लबोन्न ओलिंपिक खेलों में 200 और 400 मीटर में भारत का प्रतिनिधित्व किया पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुभव न होने के कारण सफल नहीं हो पाए लेकिन 400 मीटर प्रतियोगिता के विजेता चार्ल्स जेंकिंस के साथ हुई मुलाकात ने उन्हें न सिर्फ प्रेरित किया बल्कि ट्रेनिंग के नए तरीकों से अवगत भी कराया।इसके बाद सन 1958 में कटक में आयोजित राष्ट्रिय खेलों में उन्होंने 200 मी और 400 मी प्रतियोगिता में राष्ट्रिय कीर्तिमान स्थापित किया और एशियन खेलों में भी इन दोनों प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक हासिल किया। साल 1958 में उन्हें एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली जब उन्होंने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों में 400 मीटर प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। इस प्रकार वह राष्ट्रमंडल खेलों के व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले स्वतंत्र भारत के पहले खिलाडी बन गए। इसके बाद उन्होंने सन 1960 में पाकिस्तान प्रसिद्ध धावक अब्दुल बासित को पाकिस्तान में पिछाडा जिसके बाद जनरल अयूब खान ने उन्हें ‘उड़न सिख’ कह कर पुकारा।

रोम ओलिंपिक खेल, 1960- रोम ओलिंपिक खेल शुरू होने से कुछ वर्ष पूर्व से ही मिल्खा अपने खेल जीवन के सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में थे और ऐसा माना जा रहा था की इन खेलों में मिल्खा पदक जरूर प्राप्त करेंगे। रोम खेलों से कुछ समय पूर्व मिल्खा ने फ्रांस में 45.8 सेकंड्स का कीर्तिमान भी बनाया था। 400 में दौड़ में मिल्खा सिंह ने पूर्व ओलिंपिक रिकॉर्ड तो जरूर तोड़ा पर चौथे स्थान के साथ पदक से वंचित रह गए। 250 मीटर की दूरी तक दौड़ में सबसे आगे रहने वाले मिल्खा ने एक ऐसी भूल कर दी जिसका पछतावा उन्हें आज भी है। उन्हें लगा की वो अपने आप को अंत तक उसी गति पर शायद नहीं रख पाएंगे और पीछे मुड़कर अपने प्रतिद्वंदियों को देखने लगे जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और वह धावक जिससे स्वर्ण की आशा थी कांस्य भी नहीं जीत पाया। मिल्खा को आज तक उस बात का मलाल है। इस असफलता से सिंह इतने निराश हुए कि उन्होंने दौड़ से संन्यास लेने का मन बना लिया पर बहुत समझाने के बाद मैदान में फिर वापसी की।इसके बाद 1962 के जकार्ता में आयोजित एशियन खेलों में मिल्खा ने 400 मीटर और 4 X 400 मीटर रिले दौड़ में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 1964 के टोक्यो ओलिंपिक खेलों में भाग लिया और उन्हें तीन स्पर्धाओं (400 मीटर, 4 X 100 मीटर रिले और 4 X 400 मीटर रिले) में भाग लेने के लिए चुना गया पर उन्होंने 4 X 400 मीटर रिले में भाग लिया पर यह टीम फाइनल दौड़ के लिए क्वालीफाई भी नहीं कर पायी।मिल्खा द्वारा रोम ओलिंपिक में स्थापित राष्ट्रिय कीर्तिमान को धावक परमजीत सिंह ने सन 1998 में तोड़ा।
बाद का जीवन- सन 1958 के एशियाई खेलों में सफलता के बाद सेना ने मिल्खा को ‘जूनियर कमीशंड ऑफिसर’ के तौर पर पदोन्नति कर सम्मानित किया और बाद में पंजाब सरकार ने उन्हें राज्य के शिक्षा विभाग में ‘खेल निदेशक’ के पद पर नियुक्त किया। इसी पद पर मिल्खा सन 1998 में सेवानिवृत्त हुए।वर्ष 1958 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया पर मिल्खा ने सन 2001 में भारत सरकार द्वारा ‘अर्जुन पुरस्कार’ के पेशकश को ठुकरा दिया।मिल्खा सिंह ने अपने जीवन में जीते सारे पदकों को राष्ट्र के नाम कर दिया। शुरू में उन्हें जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम में रखा गया था पर बाद में उन्हें पटियाला के एक खेल म्यूजियम में स्थानांतरित कर दिया गया। वर्ष 2012 में उन्होंने रोम ओलिंपिक के 400 मीटर दौड़ में पहने जूते एक चैरिटी की नीलामी में दे दिया।वर्ष 2013 में मिल्खा ने अपनी बेटी सोनिया संवलका के साथ मिलकर अपनी आत्मकथा ‘The Race of My Life’ लिखी। इसी पुस्तक से प्रेरित होकर हिंदी फिल्मों के मशहूर निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने ‘भाग मिल्खा भाग’ नामक फिल्म बनायी। इस फिल्म में मिल्खा का किरदार मशहूर अभिनेता फरहान अख्तर ने निभाया।
निजी जीवन- मिल्खा सिंह ने भारतीय महिला वॉलीबॉल के पूर्व कप्तान निर्मल कौर से सन 1962 में विवाह किया। कौर से उनकी मुलाकात सन 1955 में श्री लंका में हुई थी। इनके तीन बेटियां और एक बेटा है। इनका बेटा जीव मिल्खा सिंह एक मशहूर गोल्फ खिलाडी है। सन 1999 में मिल्खा ने शहीद हवलदार बिक्रम सिंह के सात वर्षीय पुत्र को गोद लिया था। मिल्खा सम्प्रति में चंडीगढ़ शहर में रहते हैं।

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Sunday, 28 February 2016

Budhia Singh Biography in Hindi : बुधिया सिंह

Budhia Singh Biography in Hindi : बुधिया सिंह

ये “बुधिया” नाम सुनकर कुछ याद आया आपको? नहीं न .. हमारा देश बहुत जल्दी किसी को भी भूलने में माहिर है– क्यूँ की इस देश के लोगों को भूलने की आदत जो है. जिस बालक ने किसी समय साढ़े चार साल की उम्र में (4.5वर्ष) 65 किलो मीटर की दूरी सात घंटे दो मिनट में तय करके नया Records बना कर Media (मीडिया) में छा गया था. आज गुमनामी के अंधेरे में गुम है जो बालक भविष्य में ओलंपिक (Olympics) पदक दिला सकता था, आज वो सरकारी हॉस्टल में कुपोषण का शिकार है.

बुधिया सिंह (Budhia Singh)  के कोच बेरंची दास की भी हत्या कर दी गयी थी, और इस होनहार बालक की गुमनामी के अँधेरे में धकेल दिया गया था.

आईये जानते हैं इस होनहार बालक की पूरी कहानी”

बुधिया सिंह (Budhia Singh) :
Budhia Awooga Singh is an Indian boy and the Wolrd’s youngest marathon runner Budhia Singh was born in the State of Odisha.
बुधिया सिंह (Budhia Singh) भारत के ओडिशा राज्य का एक शिशु मैराथन धावक है, इस नन्हे साढ़े चार साल के बालक बुधिया सिंह ने 65 किलोमीटर की दुरी 7 घंटे 2 मिनट में तय करके पूरी दुनिया में छा गया था.
Early Life : प्रारंभिक जीवन
बुधिया सिंह  (Budhia Singh) भारत के ओडिशा State का एक शिशु है मैराथन धावक है, दोस्तों बुधिया सिंह (Budhia Singh) का नाम एक लम्बी दोड़ के लिए, लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्डस रिकार्ड्स में भी शामिल है.
बुधिया सिंह  (Budhia Singh) का जन्म एक बहुत गरीब परिवार में हुआ. वह एक अत्यनत गरीब परिवार का बेटा है जिसे उसकी माँ सुकांति सिंह ने अपने बेटे को मात्र 800 रुपए में एक आदमी को बेच दिया था.  बाद में एक स्थानीय खेल के कोच Biranchi Das (बिरंची दास) की नजर बुधिया पर पड़ी. बिरंची दास ने बुधिया सिंह  (Budhia Singh) को गोद लिया और उनके देख रेख में उसने मैराथन दोड़ने का Training लिया
बुधिया सिंह (Budhia Singh) ने चार बजे पूरी स्थित जगन्नाथ मंदिर के सिंह द्वार से अपनी दोड़ शुरू की और सात घंटे दो मिनट बाद राजधानी भुवनेश्वर पहुंचे.
दोस्तों इतिहास गवाह है की इस उम्र का कोई भी बच्चा ऐसा records नहीं बना पाया है, यह बड़ी उपलब्धि सिर्फ और सिर्फ ओड़िसा के इस नन्हे बालक ने हासिल की, और साथ ही साथ इन्होने Limca Book of World’s Records में भी अपना नाम दर्ज करवाया. बुधिया सिंह  (Budhia Singh) ने जब पूरी से अपनी दोड़ शुरू की थी, तो बड़ी संख्या में लोग वहां मौजूद थे, लोगों ने सिर्फ Budhia Singh का उत्सह नहीं बढाया बल्कि उसके समर्थन में नारे भी लगाये.  यहाँ तक की बुधिया सिंह (Budhia Singh) के समर्थन में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के कम से कम 220 जवान भी बुधिया के नैतिक समर्थन में उसके साथ दोड़ लगा रहे थे. इस आयोजन को कवर करने के लिए वहां media (मेडिया) भी मौजूद थी. जिसे CRPF प्रायोजित कर रहा था, भुवनेश्वर पहुँचने के बाद बुधिया सिंह (Budhia Singh) को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उसकी परीक्षण किया गया. बुधिया सिंह (Budhia Singh)  दिल्ली हाफ मैराथन सहित कई दोडों में हिस्सा ले चूका है.

Top 10 Important Point About Budhia Singh: रोचक जानकारी बुधिया सिंह की
•बुधिया सिंह (Budhia Singh) की प्रतिभा की खोज कैसे हुयी, ये कहानी कम रोचक नहीं हैं घरो में बर्तन माजने का काम करने वाली उसकी माँ ने गरीबी से तंग आकर इस महान बालक को सिर्फ 800 रुपए में बेच दिया था.
•भुवनेश्वर में ही रहेने वाले एक जुड़ों के कोच बिरंची दास की नजर (Budhia Singh) पर पड़ी, और इन्होने ही इस प्रतिभावन बालक को गोद ले लिया.
•बुधिया सिंह (Budhia Singh) ने साढ़े चार साल की उम्र में 65 किलोमीटर की दूरी सिर्फ सात घंटे दो मिनट में तय की थी.
• (Budhia Singh) बुधिया सिंह के इस कारनामे की वजह से उनका ये records Limca Book Of World’s Records में शामिल किया गया.
•बुधिया सिंह (Budhia Singh) के कोच Biranchi Das का कहेना है की उन्होंने दुसरे बच्चों को तंग करने के लिए बुधिया सिंह (Budhia Singh) को कई बार डांट भी लगायी थी, एक बार नाराज होकर उन्होंने (Budhia Singh) को दोड़ लगाने की सजा दी और कहा की जब तक मना न किया जाए वह दोड़ता रहे, Biranchi Das बताते हैं की में किसी काम में Busy होगया जब पांच घंटे बाद में लोटा तो दंग रह गया, वह दोड़ता ही जारहा था.
•बिरंची दास का दावा था की उन्होंने बुधिया सिंह (Budhia Singh)  की प्रतिभा को सजाया और संवारा. कई बार बिरंची दास पर आरोप भी लगा था की उन्होंने अपने फायेदे के लिए बुधिया सिंह को इस्तिमाल किया, हालांकि बिरंची दास इन आरोपों से हमेशा इनकार करते रहे.
•बिरंची दास ने ही बुधिया को गोद लिया था, उनके ही देख रेख में Budhia Singh ने मैराथन दोड़ने का Training लिया, 13 अप्रैल 2008 शाम को भुवनेश्वर में बिरंची दास की रहेस्यमय तरीके से गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी.
•बिरंची दास की हत्या के हत्यारों की खोज (संदीप आचार्य उर्फ़ राजा, और उसके सहयोगी अखाया बेहरा उर्फ़ चागला) की गिरफ्तारी ने पुरे देश में हल चल मचा दिया था.
•13 दिसम्बर 2010 को भुवनेश्वर फ़ास्ट ट्रैक (Fast Track) अदालत ने हत्यारों को दोषी पाया गया, और अंतिम 17 दिसम्बर 2010 को पारित किया गया था, दोनों दोषी राजा और उसके सहयोगी Chagala को कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी थी.
•जो बालक भविष्य में ओलंपिक पदक दिला सकता था, आज वो सरकारी हॉस्टल में कुपोषण का शिकार है, आज इस होनहार बालक को गुमनामी के अँधेरे में धकेल दिया गया है.
•एक वक्त था की (Budhia Singh) के चर्चा में आते ही विभिन्न संस्थानों ने उसके लिए ढेरों कोष बनाने की घोषणाएं की थी, media में चर्चा ही चर्चा था, लेकिन आज वही होनहार बालक गुमनामी के अँधेरे में गुम होगया है. आज बुधिया सिंह की उम्र 13-14 होगई है

दोस्तों आप सभी से मेरी गुजारिश है प्लीज इसे जियादा से जियादा share करें ताकि इस बालक को गुमनामी के अँधेरे से निकालने में मदद मिले, जरा सोचना की आपका एक छोटी सी कोशिश बहुत बड़ा काम कर सकती है.”

हमारे कार्य से अगर एक इंसान को भी फायदा होता है तो वो कार्य हमे जरूर करना चाहिए

हमारे कार्य से अगर एक इंसान को भी फायदा होता है तो वो कार्य हमे जरूर करना चाहिए

आज का इंसान इतना सेलफिश हो चुका है कि सिर्फ अपने फायदे के बारे में सोचता है वह जो भी कार्य करता है वह उन्हें खुश करने के लिए करता है  जिनसे उसे फायदा हो । लेकिन महान लोग वो होते है जो गरीब लाचार लोगो के लिए कुछ करते हो । जब आप गरीब व् लाचार लोगो के लिए कुछ करते हो तो इससे  आप को आत्मस्तुस्टी मिलेगी जिससे आप जीवन में सदा खुश रहोगे । एक
 चीनी कहावत है की अगर आप कुछ घंटो की शांति चाहते हो तो एक झपकी लेलो और अगर एक सपताह की शांति चाहिए तो पिकनिक पर चले जाए और अगर उम्र भर कुछ रहना चाहते हो तो किसी अनजान जरूरत मद की मदद कर दो ।
 एक कबीर जी का दोहा है
     ,, जब हम जगत में जगत में जगत हँसा हम रोये, ऐसी करनी कर चलो हम हँसे जग रोए ,,
 और विन्सेंट ने कहा है की जो लोग खुद के लिए जीते है वे ही असफल हैं । 

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समाज के लिए तभी कुछ किया जा सकता है जब हमारी सोच पॉजिटिव होगी

समाज के लिए तभी कुछ किया जा सकता है जब हमारी सोच  पॉजिटिव होगी

जब इंसान की सोच पॉजिटिव होती है तभी वह किसी को कुछ देने की सोचता है । और पॉजिटिव सोच में ही ये आता है की हर इंसान को बराबरी का अधिकार मिले । इस अधिकार में सबसे पहले आती हैं  महिलाएं । समाज के निर्माण में महिलाएं कधे से कधा मिलकर पुरषो   के साथ हर काम में  सहयोग दे रही हैं । घर हो आफिस या राजनीती वे हर जगह अपना कर्तव्य निभा रही हैं । सरकार की तरफ से तो बराबरी का दर्जा मिला है  लेकिन   घर में  अभी भी सोच छोटी ही हो जाती है । जेंट्स आफिस से आते ही सोफे पर लेटकर आराम से टी वी देखते हैं और लेडीज़ किचन व् घर की जिम्मेदारियां संभालती हैं । अगर माँ बेटी के साथ साथ बेटे से भी थोड़ी बहुत काम में मदद ले और बहन बेटियों की  वेलु समझाए तो महिलाएं कमजोर नही सस्कत बन कर जी सकती हैं  । इंद्रागाँधी प्रतिभा पाटिल कल्पनाचावला की तरह से  समाज के लिए योगदान  कर सकती हैं । इनकी योग्यता निखारने के लिए सिर्फ आपके स्पॉट की जरूरत है । अगर इन्हे घर में सहयोग मिले तो हो सकता है की आप की माँ बहन  बीबी या बेटी की योग्यता आप से भी अधिक हो एक बार बराबरी का मौका देकर तो देखें ।

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मांगने की बजाए, जिंदगी में देना सीखें

मांगने  की बजाए, जिंदगी में  देना सीखें

जीवन की सबसे सुखद अनुभूति देने में है।  दुनिया  महात्मा गांधी , मदरटरेसा , ए  पी  जे अब्दुल कलाम जैसे देश को कुछ  देने वालो को याद करती है। ना की लेने वालो को  कुछ देने वाले ही समाज को कुछ देकर जाते हैं , जिस से समाज व दुनिया का कुछ भला होता है।  जब हम किसी को निस्वार्थ कुछ देते हैं  या मद्त करते हैं, तो  लेने वाले का  ह्रदय प्रसन्न होता है और वह उसे अंतिरक करण से उसे दुआ देता है । और जो दुआ उसे मिलती है वो उसे यश्स्वी बना देती है।  देने  का मतलब सिर्फ ये नही है की आप किसी की रूपये पैसे से ही मद्त करें। जिसे फाइनेंसियल स्पॉट की जरूरत है तो  करें  जिसे मॉरल स्पॉट की जरूरत है उसे मोरल स्पॉट करें और जिसे फिजिकली  हेल्प चहिए उसे फिजिकली हेल्प करें। देनें का सबसे बड़ा महत्व तो ये है कि जब हम किसी और की मदद करते हैं तो उस से पहले खुद की मद्त हो जाती है।  लेकिन किसी की मदद करते हुए ये जरूर सोचें कि  ये मदद आप क्यों कर रहे हो। मद्त सिर्फ इंसानियत के नाते करें इसे किसी लालच वस या अहसान जताने के लिए ना करें। वरना आप दोस्त से ज्यादा दुश्मन बन जाओगे। एक बात का धयान रहे कि एक हाथ से मदद करते हो तो दूसरे को पता भी नही लगना  चाहिए। वरना आप किसी की मदद कम करोगे और उसे कह अधिक दोगे। और आप का दूसरे लोगो से कहना ही मदद लेने वाले इंसान को अछा नही लगेगा।
 मै आपको अपने एक दोस्त की  आप बीती सुनती हू  मेरे दोस्त ने एक कंपनी डाली । उसे हेल्प की जरूरत थी उसने वो हेल्प अपने किसी बेस्ट फ्रेंड  से ली।  कुछ साल बाद उन दोनों के बीच में किसी तीसरे इंसान की वजह से कुछ दूरिया आ गईं ।  उसने सबके सामने  उसे नीचा दिखाना शुरू कर दिया और लोगो से बोलना शुरु किया  कि हमने इसे बसाया है, हमारे बिना ये कुछ नही कर सकता था।  इस बात से उसे  इतना दुःख हुआ की  वह यही सोचता की इससे अछा था की में उसकी मदद ना लेता  हमेशा उस दिन को कोसता है कि मैने उससे हेल्प क्यों ली  ?ऐसा तो नही था की उसके बिना वो काम न होता। उसने करके, सबसे कहकर कर, करे  कराए पर पानी फेर दिया। जबकि  मेरा   दोस्त उसका  दिल से अहसान मानता था।  और आपस में कोई बात भी नही थी लेकिन उसने  अहसान जता कर  अपनी सारी वेलू खत्म कर दी और कही न कही दोस्ती मे खटास आ गईं । और वह खुद को साबित करने के लिए  वह मदद करने वालो को इग्नोर करके खुद अपना रास्ता चुन कर आगे बढ़ गया । आज उन्हें लगता है कि वो उन्हें अहमियत नही देता ।  इस लिए कहते कि नेकी कर दरया मे फेंक।  अगर आप किसी की हेल्प करते हो तो  उसे बार  बार मत दोहराओ  ।
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Saturday, 27 February 2016

जिंदगी में कुछ भी असंभव नहीं है

जिंदगी में कुछ भी असंभव नहीं है – निकोलस वुजिसिक / Nick Vujicic Biography In Hindi

मान लीजिये की एक दिन के लिये अपने जीवन में आपके पास हात और पैर ही नही है. अपने जीवन को बिना हात और पैरो के जीने की कोशिश करे. निश्चित ही आप ऐसा नही कर पाओगे, लेकिन निकोलस वुजिसिक से मिलिये, जिनका जन्म 1982 को मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया में हुआ, उनका जन्म ही बिना हात और पैरो के हुआ था. कई डॉक्टर उनके इस विकार को सुधारने में असफल हुए. और आज भी निक अपना जीवन बिना हात और पैरो के ही जी रहे है. हात-पैरो के बिना प्रारंभिक जीवन बिताना उनके लिये काफी मुश्किल था. बचपन से ही उन्हें काफी शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था. लेकिन उन्होंने कभी अपने इस विकार से हार नही मानी, और हमेशा वे औरो की तरह ज़िन्दगी को जीने की कोशिश करते रहे. निक को हमेशा आश्चर्य होता था की वे दुसरो से अलग क्यू है. वे बार-बार अपने जीवन के मकसद को लेकर प्रश्न पूछा करते थे और उनका कोई उद्देश्य है या नही ये प्रश्न भी अक्सर उन्हें परेशान करता था.
निक के अनुसार, आज उनकी ताकत और उनकी उपलब्धियों का पूरा श्रेय भगवान पर बने उनके अटूट विश्वास को ही जाता है. उन्होंने कहा है अपने अब तक के जीवन में जिनसे भी मिले फिर चाहे वह दोस्त हो, रिश्तेदार हो या सहकर्मी हो, उन सभी ने उन्हें काफी प्रेरित किया.
19 साल की आयु में अपने पहले भाषण से लेकर अब तक निक पुरे विश्व की यात्रा कर रहे है और अपनी प्रेरणादायी घटनाओ से लोगो को प्रेरित कर रहे है. विश्व भर में आज निक के करोडो अनुयायी है, जो उन्हें देखकर प्रेरित होते है. आज युवावस्था में भी उन्होंने बहोत से पुरस्कार हासिल किये है. आज वे एक लेखक, संगीतकार, कलाकार है और साथ ही उनको फिशिंग, पेंटिंग और स्विमिंग में भी काफी रूचि है. 2007 में निक ने ऑस्ट्रेलिया से दक्षिण कैलिफ़ोर्निया की लंबी यात्रा की, जहा वे इंटरनेशनल नॉन-प्रॉफिट मिनिस्ट्री, लाइफ विथआउट लिम्बस के अध्यक्ष बने, जिसकी स्थापना 2005 में की गयी थी. 1990 में उन्होंने अपनी इस बहादुरी के लिये ऑस्ट्रेलियन यंग सिटीजन अवार्ड भी जीता 2005 में यंग ऑस्ट्रेलियन ऑफ़ द इयर पुरस्कार के लिये उनका नाम निर्देशन भी किया गया था.
निक कहते है, “यदि भगवान किसी बिना हात और पैर वाले इंसान का उपयोग अपने हात और पैर समझकर करते है, तो वे किसी के भी दिल का उपयोग कर सकते है.”
जब कभी हमारी ज़िन्दगी में समस्याएँ या मुश्किलें आतीं हैं, तो हम में से ज्यादातर लोग सोचतें हैं कि ऐसा मेरे साथ ही क्यों हो रहा है? यही सोच धीरे-धीरे हमारे अन्दर घोर निराशा पैदा करके हमारी ज़िन्दगी को एक बोझ बना सकती है. ऎसे में जरूरत है कि हम ख़ुद पर भरोसा रखें और अपनी पूरी ताकत के साथ उनका मुक़ाबला करें, और ऐसा तब तक करतें रहें जब तक हम उन पर विजय हासिल ना कर लें. आप सोचेंगे कि यह असंभव है, लेकिन विश्वास मानिए
“जिंदगी में कुछ भी असंभव नहीं है”.
33 वर्षीय निक विजुसिक आज ना सिर्फ़ एक सफल प्रेरक वक्ता हैं, बल्कि वे वह सब करते है जो एक सामान्य व्यक्ति करता है. जन्म से ही हाथ-पैर न होने के बावजूद वे वे गोल्फ व फुटबॉल खेलतें है, तैरते हैं, स्काइडाइविंग और सर्फिंग भी करतें हैं. यह अपने आप में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है, लेकिन इससे भी ज्यादा प्रभावित करने वाली बात है, उनकी जीवन के प्रति खुशी और शांति की सम्मोहक भावना. आज वे दुनिया को जिंदगी जीने का तरीका सिखा रहे है.
निक ने भौतिक सीमाओं में जकड़े रहने के बजाए अपने जीवन को नियंत्रित करने की शक्ति पा ली और आशा के इसी संदेश के साथ 44 से अधिक देशों की यात्रा की है.
जहाँ हम छोटी-छोटी बातों से परेशान और हताश हो जाते है वहीँ निक वुजिसिक जैसे लोग हर पल यह साबित करते रहते है कि असंभव कुछ भी नहीं – प्रयास करने पर सब कुछ आसान हो जाता है.
ज़िन्दगी द्वारा दी गयी हर चीज को खुलेमन से स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे मुश्किलें ही क्यों ना हों. मुश्किलें ही वो सीढ़ियां हैं जिन पर चढ़कर ही हमे ज़िन्दगी में कामयाबी और खुशी मिलेगी.

गलती से सीखकर, सुधारना ही सुखद जीवन का आधार हैं

गलती से सीखकर, सुधारना ही सुखद जीवन का आधार हैं
एक संत यात्रा पर निकले कई दिनों तक चलने के बाद एक गाँव आया जहाँ उन्होंने विश्राम करने का सोचा उन्होंने अपने शिष्य से गाँव में खबर भिजवाई कि वे किसी सज्जन परिवार के घर भोजन करेंगे | संत को छुआछूत में विश्वास था |

शिष्य यह संदेशा लेकर गाँव के हर एक घर के दरवाजे को ख़ट खटाता हैं और कहता हैं हे सज्जन मेरे गुरुवर आज इसी गाँव में ठहरे हैं और उनका यह व्रत हैं कि वे किसी सज्जन शुद्ध आचरण वाले व्यक्ति के घर का ही भोजन ग्रहण करेंगे |क्या आप उन्हें भोजन करवाएंगे ? इस पर उस गाँववासी ने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा – हे बंधू मैं नराधम हूँ मेरे आलावा इस गाँव में सभी वैष्णव हैं फिर भी अगर आपके गुरु मेरे घर आश्रय ले तो मैं खुद को भाग्यशाली मानूंगा | शिष्य गाँव के हर एक घर गया पर सभी ने खुद को अधम और दूसरों को सज्जन कहा |

शिष्य ने गुरु के पास जाकर पूर्ण विस्तार से पूरी घटना सुनाई यह सुन गुरु गाँव में आये और उन्होंने सभी से क्षमा मांगी कहा – आप सभी सज्जन हैं अधम तो मैं खुद हूँ जो ईश्वर के बनाये इंसानों में भेद कर रहा हूँ | आज आप सभी के साथ रुकना मेरे लिए सौभाग्य होगा इससे मेरा अंतःकरण शुद्ध होगा |

कहानी की शिक्षा :
इन्सान भगवान के बनाये हैं इन में कोई भेद नहीं होता | यह भेद देखने वाले की दृष्टि में होता हैं | यह संसार भगवान की देन हैं इसमें ऊँचा नीचा देखने वाले ही छोटी सोच के लोग हैं |
अपने आपको को इस तरह के अज्ञान से दूर करे जब भी अपनी गलती का अहसास हो उसे सुधारे जैसे कहानी में संत ने किया | गलती सभी से होती हैं पर उसे स्वीकार कर ठीक करने वाल महान होता हैं |

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स्टार्टअप क्या है कम पूंजी से शुरू होने वाले बिज़नेस || What is a startup, a business starting with low capital

स्टार्टअप क्या है स्टार्टअप का मतलब एक नई कंपनी से होता है।आमतौर पर उसको शुरू करने वाला व्यक्ति उसमें निवेश करने के साथ साथ कंपनी का संचालन ...